इन दिनों भारत के कई हिस्सों में तापमान 45-46 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। शहरों में हम AC और कूलर का सहारा लेकर इस चिलचिलाती गर्मी से बचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन खुले खेतों में काम करने वाले हमारे किसानों के लिए यह मौसम किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब केवल किताबों में पढ़ने वाला विषय नहीं रहा, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी कृषि और खाद्य सुरक्षा पर प्रहार कर रहा है।
आइए समझते हैं कि 45-46°C के इस जानलेवा तापमान का भारतीय किसानों, फसलों और हमारी थाली पर क्या असर पड़ रहा है:
1. फसल बर्बादी और पैदावार में भारी गिरावट (Crop Failures)
पौधों को पनपने के लिए एक अनुकूल तापमान की आवश्यकता होती है। जब तापमान 40 डिग्री के पार जाता है, तो पौधों का प्राकृतिक विकास रुक जाता है।
- समय से पहले पकना: अत्यधिक गर्मी के कारण अनाज (जैसे गेहूं या ग्रीष्मकालीन फसलें) के दाने पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही सूख कर सिकुड़ जाते हैं।
- सब्जियों और फलों का झुलसना: गर्मी के कारण टमाटर, नींबू, हरी सब्जियां और आम जैसी फसलें खेतों और बागों में ही झुलस कर खराब हो रही हैं। कृषि विशेषज्ञों द्वारा इस साल पैदावार (Yield) में भारी गिरावट की भविष्यवाणी की जा रही है।
2. मिट्टी की नमी खत्म होना और जल संकट
45-46°C तापमान के कारण मिट्टी की नमी बहुत तेजी से भाप (Evaporation) बनकर उड़ रही है।
फसलों को जिंदा रखने के लिए किसानों को सामान्य से दोगुनी सिंचाई करनी पड़ रही है। इस अंधाधुंध सिंचाई के कारण भूजल स्तर (Groundwater Table) और भी तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे कई इलाकों में ट्यूबवेल और कुएं पूरी तरह सूखने की कगार पर आ गए हैं।
3. पशुपालन और डेयरी सेक्टर पर बुरा असर
भारतीय किसानों की आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा पशुपालन से आता है। इस भीषण 'हीटवेव' (Heat stress) का असर केवल फसलों पर ही नहीं, बल्कि पशुओं पर भी पड़ रहा है। हरे चारे और पानी की कमी के साथ-साथ गर्मी के तनाव से गायों और भैंसों का दूध उत्पादन काफी घट जाता है, जिससे छोटे किसानों की दैनिक आय प्रभावित होती है।
4. किसानों की बढ़ती लागत और कर्ज का जाल
जैसा कि हमने अपने पिछले ब्लॉग में चर्चा की थी, खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। फसलों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए किसानों को बार-बार पंप चलाकर सिंचाई करनी पड़ती है। डीजल और बिजली का अतिरिक्त खर्च उनकी लागत (Input Cost) को बहुत बढ़ा देता है। एक तरफ लागत बढ़ रही है और दूसरी तरफ फसल खराब हो रही है—यह स्थिति किसानों को कर्ज के जाल में धकेल देती है।
शहरी उपभोक्ताओं के लिए इसका क्या अर्थ है?
खेतों में झुलसती फसल का सीधा मतलब है 'खाद्य मुद्रास्फीति' (Food Inflation)। पैदावार कम होने और मंडियों में सप्लाई घटने के कारण, आने वाले दिनों में शहरों में सब्जियों, फलों और रोजमर्रा के अनाज की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिलेगा।
समाधान की ओर:
यह भीषण गर्मी हमारे लिए एक चेतावनी है। हमें पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर 'एग्रीटेक' (Agritech), ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, और जलवायु-अनुकूल फसलों (जैसे मिलेट्स/मोटे अनाज) को तेजी से अपनाना होगा।