हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की खबरें फिर से सुर्खियों में हैं। शहरों में, हम अक्सर अपनी कारों या दैनिक यात्रा (commute) के बढ़ते खर्च को लेकर परेशान होते हैं। लेकिन इस महंगाई का एक बहुत बड़ा और छिपा हुआ असर भारतीय कृषि और हमारे देश के छोटे किसानों पर पड़ता है।
खेती अब सिर्फ बैलों और हल तक सीमित नहीं है; आधुनिक भारतीय कृषि काफी हद तक ईंधन (Fuel) पर निर्भर है। आइए समझते हैं कि पेट्रोल और विशेष रूप से डीजल की कीमतों में उछाल का किसानों और हमारी खाद्य सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है:
1. मशीनरी और सिंचाई का भारी खर्च (Machinery & Irrigation)
खेत की जुताई से लेकर फसल की कटाई तक, हर कदम पर ईंधन की आवश्यकता होती है।
- ट्रैक्टर और हार्वेस्टर: ये सभी भारी कृषि मशीनें पूरी तरह से डीजल पर चलती हैं।
- सिंचाई (Irrigation): भारत के कई हिस्सों में आज भी बिजली की अनियमित आपूर्ति के कारण किसान अपने खेतों की सिंचाई के लिए 'डीजल पंपों' पर भारी निर्भर हैं। डीजल के दाम बढ़ने का सीधा मतलब है कि फसल को पानी पिलाने की लागत में अचानक वृद्धि हो जाना।
2. खेत से मंडी तक का सफर (Transportation Costs)
जैसा कि हमने अपने पिछले ब्लॉग में 'खेत से फ्रिज तक' के सफर को समझा था, फसल कटने के बाद उसे तुरंत मंडी या कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाना होता है। जब डीजल महंगा होता है, तो मालवाहक ट्रकों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का भाड़ा (freight charges) तुरंत बढ़ जाता है। किसान को अपनी ही फसल बेचने के लिए अपनी जेब से ज्यादा पैसे ट्रांसपोर्टर को देने पड़ते हैं।
3. उर्वरक और बीजों की महंगाई (Input Costs)
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का एक 'चेन रिएक्शन' (Chain Reaction) होता है। खेती के लिए आवश्यक चीजें जैसे बीज, उर्वरक (Fertilizers) और कीटनाशकों को कारखानों से ग्रामीण इलाकों तक ट्रकों द्वारा पहुँचाया जाता है। परिवहन लागत बढ़ने से इन सभी कृषि-सामग्रियों (Agricultural Inputs) के दाम भी बाजार में बढ़ जाते हैं।
4. किसानों का घटता मुनाफा और कर्ज
खेती में किसान अपनी फसल का दाम खुद तय नहीं कर सकता। बुवाई के समय उसकी लागत (Input cost) अचानक बढ़ जाती है, लेकिन अगर बाजार में फसल की कीमत या सरकार द्वारा तय MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) उसी अनुपात में नहीं बढ़ती है, तो सारा वित्तीय नुकसान किसान को उठाना पड़ता है। इससे छोटे किसान कर्ज के जाल में फंस सकते हैं।
शहरी उपभोक्ताओं के लिए इसका क्या अर्थ है?
ईंधन की कीमतों का असर सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहता। जब खेत में फसल उगाने और उसे शहर तक लाने की लागत बढ़ती है, तो अंततः इसका असर शहरी उपभोक्ताओं के किराना बिल (Grocery bills) पर खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) के रूप में दिखाई देता है। आपकी सब्जियों और अनाज का महंगा होना इसी चक्र का हिस्सा है।
समाधान की ओर एक कदम:
इस समस्या से निपटने के लिए हमें कृषि में 'सौर ऊर्जा' (Solar Water Pumps) को बढ़ावा देने और 'एग्रीटेक' (Agritech) आपूर्ति श्रृंखलाओं को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि ईधन पर हमारी निर्भरता कम हो सके।